Lake Nyos Disaster : cameroon Limnic Eruption | नींद में मर गए 1,746 लोग, सफेद पड़ गए लाशों के चेहरे, झील के रास्ते आया था ‘दानव’

दुनिया में कई ऐसी जगहें हैं जहां कुदरत की खूबसूरती के पीछे मौत का खौफनाक कहानी जरूर छिपी होती है. पश्चिम-मध्य अफ्रीका के कैमरून में स्थित लेक न्योस एक ऐसी ही झील है. 21 अगस्त 1986 की उस काली रात को इस झील ने कुछ ऐसा किया कि 1,700 से ज्यादा लोग अपनी नींद से कभी जाग ही नहीं पाए. बताया जाता है कि ये घटना उस दौर में हुई जब झील ने ‘कत्लेआम’ मचाया लेकिन दुनिया को भनक तक नहीं लगी.
वो खौफनाक रात: जब सन्नाटे में मौत बरसी
तारीख थी 21 अगस्त 1986 और लेक न्योस के पास बसे गांवों के लोग या तो सो रहे थे या अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में बिजी थे. अचानक रात के सन्नाटे में एक गहरा गड़गड़ाहट जैसा शोर सुनाई दिया. झील की सतह से सफेद धुंध उठी और देखते ही देखते आसपास की घाटियों में फैल गई. गांव वालों को सड़े हुए अंडों जैसी हल्की गंध महसूस हुई, लेकिन इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, लोग जहां के तहां गिरकर दम तोड़ने लगे.
अगली सुबह जब दुनिया की नजर इस इलाके पर पड़ी तो मंजर दिल दहला देने वाला था. सड़कों पर, घरों में और बिस्तरों पर लोग मृत पाए गए. ऐसा लग रहा था मानो किसी ने समय को रोक दिया हो. न कोई चोट का निशान, न डिफेंस के संकेत, बस लाशों का ढेर था. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस घटना में 1,746 लोग और करीब 3,000 मवेशी मारे गए थे.
क्या यह कोई ‘श्राप’ था या कुदरत का खेल?
शुरुआत में लोगों ने इसे कोई दैवीय प्रकोप माना लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम जांच के लिए पहुंची तो सच सामने आया. लेक न्योस एक प्राचीन ज्वालामुखी के क्रेटर में बनी झील है. वैज्ञानिकों ने पाया कि झील की गहराई में भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड जमा थी.
उस रात एक दुर्लभ प्राकृतिक घटना हुई जिसे ‘लिमनिक इरप्शन’ कहा जाता है. किसी भूस्खलन या छोटे भूकंप की वजह से झील की निचली सतह में दबी करीब 1 लाख से 3 लाख टन गैस अचानक बाहर निकल आई. कार्बन डाइऑक्साइड हवा से भारी होती है, इसलिए यह ऊपर उठने के बजाय जमीन की सतह से सटकर घाटियों में फैल गई. इसने हवा से ऑक्सीजन को पूरी तरह हटा दिया, जिससे लोग और जानवर सोते हुए ही दम घुटने के कारण मर गए.
क्या लेक न्योस आज भी खतरनाक है?
सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट में चेतावनी दी गई है कि खतरा टला नहीं है. ये सच है कि लेक न्योस को पूरी तरह सुरक्षित नहीं कहा जा सकता लेकिन वैज्ञानिकों ने इस पर काबू पाने के लिए बड़े कदम उठाए हैं.
डिगासिंग पाइप्स : 2001 में झील के भीतर विशेष पाइप लगाए गए, जो नीचे दबी कार्बन डाइऑक्साइड को धीरे-धीरे बाहर निकालते रहते हैं. इससे गैस का दबाव नहीं बन पाता.
पल-पल की खबर : वैज्ञानिक आज भी इस झील के गैस स्तर और ज्वालामुखी गतिविधि पर पल-पल नजर रखते हैं.
लेक किवू: अगला बड़ा खतरा?
वायरल पोस्ट में लेक किवू का भी जिक्र है, जो रवांडा और कांगो की सीमा पर स्थित है. ये झील न्योस से कहीं ज्यादा बड़ी है और इसमें कार्बन डाइऑक्साइड के साथ-साथ भारी मात्रा में मीथेन गैस भी जमा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर यहां लेक न्योस जैसा विस्फोट हुआ तो लाखों लोगों की जान खतरे में पड़ सकती है. हालांकि, फिलहाल इस पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है और गैस निकालने के प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है.



