National

एक ने बसाया जन्नत, दूसरे ने लूटी दौलत तो किसी और ने देखे बेटों के कत्ल, दिलचस्‍प है दिल्‍ली की लालकिले की कहानी

होमफोटोदेश

387 साल पुरानी 12 मई से जुड़ी है दिल्‍ली के दिलचस्‍प किले की कहानी!

Last Updated:May 12, 2026, 06:01 IST

Lal Qila ki Dilchasp kahani लाल किले की प्राचीर पर खड़ा देवांग अपनी बहन गौरी को लालकिले से जुड़ी वह कहानी बता रहा है, जिसे जानकार आप भी हैरान रह जाएंगे. इस कहानी में 12 मई 1639 की नींव से लेकर नहर-ए-बिहिश्त की ठंडक, तख्त-ए-ताऊस के हीरे, चांदी की छत, अंग्रेजों का बर्बर कहर, बहादुर शाह जफर के बेटों का कत्ल सहित कई घटनाओं का जिक्र किया गया है.

देवांग और गौरी लाल किले की प्राचीर के पास खड़े थे. देवांग ने गौरी की तरफ देखा और बोला- गौरी, आज 12 मई है. गौरी हंस दी- तो, मेरा बर्थडे नहीं है. देवांग मुस्कुराया और बोला – नहीं, आज से ठीक 387 साल पहले इसी दिन एक शाह ने धरती पर अपना जन्नत बसाने की नींव रखी थी. वो जन्नत है… ये लाल किला. चल, आज तुझे इसकी हर ईंट की कहानी सुनाता हूं.

गौरी ने पूछा- अच्छा, ये लाल-लाल क्यों है? देवांग ने शरारत से कहा- खून से थोड़े ही! गौरी बोली- अरे यार! फिर देवांग सीरियस हो गया- असल में, शाहजहां ने फतेहपुर सीकरी से लाल बलुआ पत्थर यमुना के रास्ते मंगवाए थे और अंदर के महलों के लिए राजस्थान से सफेद संगमरमर. इन पत्थरों पर फूल इस कदर तराशे कि लगे मानो किसी ने दीवारों पर चित्रकारी कर दी हो. ये काम 9 साल चला. 9 साल! तूने कभी 9 साल किसी चीज पर लगाए?

देवांग ने सवाल किया- पता है, इस किले को बनने में कितना खर्चा हुआ? गौरी ने अंदाजा लगाया- दस-बीस करोड़? गौरी हंस दी- नहीं, उस जमाने में एक करोड़ रुपये. सुन, हैरान मत हो- उस वक्त ये कई राज्यों का सालाना बजट होता था. यानी शाहजहां ने पूरे राज्यों की कमाई एक किले पर लुटा दी. गौरी बोला- वो तो प्यार में दीवाने थे. गौरी ने कहा- हां, अपनी मुमताज के लिए तो ताजमहल बनवाया, अपने शौक के लिए ये लाल किला.

Add as Preferred Source on Google

देवांग अब सबसे दिलचस्प बात लेकर आया- ये प्राचीर देख रही है? गौरी ने ऊपर देखा – हां, ऊंची-ऊंची. देवांग ने समझाया- मुगल काल में इस प्राचीर पर चढ़ने का मतलब था बादशाह के दरबार तक सीधी पहुंच. यानी तू दुनिया के सबसे ताकतवर आदमी से मिलने वाली थी. ऐसे इंसान को कहते थे ‘खास’. गौरी ने पूछा- और आज? देवांग गर्व से बोला- आज इसी प्राचीर से प्रधानमंत्री देश को संबोधित करते हैं. 15 अगस्त 1947 से ये परंपरा है.

गौरी को गर्मी की फिक्र हुई- गर्मी में यहां लगता तो बहुत तपती होगी. देवांग ने चालाकी से कहा- यही तो चमत्कार है. शाहजहां ने यमुना से एक नहर बनवाई ‘नहर-ए-बिहिश्त’ यानी स्वर्ग की नहर. ये पूरे किले में बहती थी. गौरी चौंकी- पानी से ठंडक? देवांग बोला – हां! रंग महल के पास ये नहर छोटे झरने में बदल जाती थी. बैलों से चलने वाली रहटें रात-दिन पानी बहाती थीं. सचमुच का एसी सिस्टम वो भी 400 साल पहले.

अब देवांग की आवाज धीमी हो गई. अब बात करते हैं दुनिया के सबसे कीमती तख्त की. तख्त-ए-ताऊस यानी मयूर सिंहासन. गौरी उत्सुक थी. उसने पूछा- कैसा था? देवांग ने कहा – सात सोने के मोर – उनकी पूंछ में माणिक, पन्ना, नीलम, हीरे… सोने-चांदी के बर्तन, खुरासान के कालीन, रंगीन काँच के झूमर. गौरी ने पूछा – आज कहां है? देवांग उदास हो गया. वह बोला- जब 1739 में नादिरशाह ने दिल्ली लूटी, वो सब ले गया. कोहिनूर हीरा भी, जो आज ब्रिटेन के ताज में जड़ा है. समझ, हमारे दादा-परदादाओं का गहना आज किसी और के सर पर सो रहा है.

गौरी ने पूछा- मुगलों के बाद क्या हुआ? देवांग ने बताया- आए मराठे. 1760 के दशक में सदाशिवराव भाऊ ने लाल किला जीत लिया. पर सेना के खर्चे के लिए उन्हें पैसे चाहिए थे. गौरी ने पूछा- क्या किया? देवांग बोला- दीवान-ए-खास की चांदी की छत तोड़कर उसे पिघलाया और सिक्के बनाए. सोच जहां बादशाह बैठता था, वहां अब छत ही नहीं बची.

गौरी का सवाल था- अंग्रेजों ने क्या किया? देवांग बहुत गंभीर हो गया. वह बोला- 1857 का विद्रोह. अंग्रेज हारे नहीं, टूट पड़े. उन्होंने किले के 80% से ज्‍यादा हिस्से तोड़ डाले. सफेद मार्बल के महल गिरा दिए, उनकी जगह बैरकें बनाईं. गौरी फफक पड़ी और बोली-ये तो कत्ल है. देवांग ने सबसे बुरी बात बताई- और सबसे बुरा बहादुर शाह जफर के तीन बेटों को बिना मुकदमे के गोली मार दी. अंग्रेज हडसन ने बूढ़े बादशाह को अपने बेटों के शव दिखाए. फिर जफर को बर्मा भेज दिया, जहां वह अकेले मर गए.

देवांग अब उत्तेजित हो गया- अब आता है 1945 का वो मुकदमा. अंग्रेजों ने आजाद हिंद फौज के तीन अफसरों शाह नवाज, गुरबख्श सिंह, प्रेम सहगल का यहीं किले में कोर्ट-मार्शल किया. गौरी ने पूछा- फिर क्या हुआ? देवांग बोला- फिर क्या, पूरा देश सड़कों पर उतर आया. हिंदू-मुस्लिम एक साथ. यहां तक कि ब्रिटेन को दुनिया के सामने शर्मिंदा होना पड़ा. ये आजादी की शुरुआत की आग थी.

देवांग की आंखों में चमक आ गई. अब सबसे सुनहरा पल. 15 अगस्त 1947, सुबह. नेहरू जी इसी प्राचीर पर चढ़े. गौरी ने पूछा- तिरंगा लहराया? देवांग ने कहा- हां. वो तिरंगा राजस्थान के आलूदा गांव में बना था. और जब झंडा फहरा, तो बिस्मिल्लाह खान ने शहनाई बजाई. सोच, वो दृश्य – 200 साल की गुलामी के बाद, लाल किले की दीवारें, शहनाई की आवाज, और उड़ता तिरंगा. गौरी भावुक हो गई.

Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Uh oh. Looks like you're using an ad blocker.

We charge advertisers instead of our audience. Please whitelist our site to show your support for Nirala Samaj