हैदराबाद की रूहानी विरासत, आबदारखानों में मिट्टी की खुशबू संग घुलती थी शहर की तहजीब, जानें अनसुनी कहनी

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हैदराबाद की रूहानी विरासत, जहां प्यास बुझाने को माना जाता था सबसे बड़ी इबादत
Last Updated:May 09, 2026, 15:45 IST
Hyderabad Abdarkhana History: हैदराबाद के ऐतिहासिक आबदारखाने कभी शहर की प्यास बुझाने का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करते थे. कुतुब शाही और आसिफ जाही दौर में बनाए गए ये प्याऊ मुसाफिरों और राहगीरों को ठंडा पानी और शरबत उपलब्ध कराते थे. यहां बिश्ती मशकी में पानी भरकर लोगों तक पहुंचाते थे और मिट्टी के कुलिया में पानी पिलाया जाता था. आबदारखानों की खास पहचान उनका प्राकृतिक रेफ्रिजरेशन सिस्टम और सामाजिक सौहार्द था. यहां बिना किसी भेदभाव के हर धर्म के लोग पानी पीते थे. आज भी हैदराबाद में यह सेवा भावना इंसानियत और गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल मानी जाती है.
पुराने दौर में पानी पिलाने वाले व्यक्ति को बिश्ती कहा जाता था. वे जानवर की खाल से बनी मशकी में पानी भरकर लोगों तक पहुंचाते थे. उस समय पानी पीने के लिए मिट्टी के छोटे प्यालों का उपयोग किया जाता था, जिन्हें कुलिया कहा जाता था. इतिहास की कहानियों के अनुसार, गोलकुंडा के पतन के बाद जब अंतिम सुल्तान अबुल हसन तानाशाह को बंदी बनाकर ले जाया जा रहा था, तब एक बिश्ती ने उन्हें पूरे सम्मान के साथ पानी पेश किया था. सुल्तान उसकी सेवा और सम्मान से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इनाम के तौर पर अपनी अंगूठी उसे भेंट कर दी थी.
हैदराबाद के आबदारखाने सिर्फ पानी पिलाने की जगह नहीं थे, बल्कि सामाजिक एकता और भाईचारे के प्रतीक माने जाते थे. खासतौर पर मुहर्रम के दौरान यहां सबील-ए-नजरे हुसैन के नाम से विशेष इंतजाम किए जाते थे. लोगों के लिए गुलाब, केवड़े और गुड़ से बने शरबत तैयार किए जाते थे, जिन्हें ऊद की खुशबू से महकाया जाता था. इन आबदारखानों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यहां बिना किसी मजहबी भेदभाव के हर धर्म के लोग एक साथ पानी पीते थे. यही परंपरा आज भी हैदराबाद की गंगा-जमुनी तहजीब और सांस्कृतिक सौहार्द की पहचान मानी जाती है.
आबदारखाने पुराने दौर के ऐसे प्याऊ थे, जिन्हें खासतौर पर मुसाफिरों और राहगीरों के लिए बनाया जाता था. ये आमतौर पर घास के छप्पर वाली छोटी और ठंडी इमारतें होती थीं. इनका निर्माण इस तरह किया जाता था कि भीषण गर्मी में भी पानी ठंडा और शीतल बना रहे. कुतुब शाही दौर में इन आबदारखानों का विशेष महत्व था. खासकर 1594 के बाद बादशाही आशुरखानों और प्रमुख व्यापारिक मार्गों पर इनका बड़े पैमाने पर निर्माण कराया गया. ये स्थान केवल पानी पिलाने तक सीमित नहीं थे, बल्कि लोगों के आराम और सामाजिक मेलजोल का भी महत्वपूर्ण केंद्र माने जाते थे.
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भले ही आबदारखानों की पुरानी इमारतें समय के साथ कमजोर हो गई हों, लेकिन हैदराबाद के लोगों के दिलों में पानी पिलाने का जज्बा आज भी जिंदा है. शहर में आज भी कई ऑटो चालक, छोटे दुकानदार और एनजीओ अपने खर्च पर राहगीरों के लिए ठंडे पानी के कूलर और मिट्टी के घड़े रखते हैं. गर्मी के दिनों में यह पहल लोगों को राहत पहुंचाने का काम करती है. यह परंपरा हैदराबाद की इंसानियत और भाईचारे की पहचान मानी जाती है. यह कहानी हमें याद दिलाती है कि पानी का हर कतरा अनमोल है और उसे साझा करना मानवता की सबसे बड़ी मिसाल है.
हैदराबाद अपने गौरवशाली इतिहास, अनूठी संस्कृति और सेवा भावना के लिए दुनियाभर में पहचाना जाता है. सल्तनत-ए-कुतुब शाही से लेकर आसिफ जाही दौर तक इस शहर में प्यासों को पानी पिलाना मानवता की सबसे बड़ी सेवा और इबादत माना गया. इसी सोच से आबदारखानों की परंपरा शुरू हुई, जो सदियों तक लोगों की प्यास बुझाने का प्रमुख केंद्र बने रहे. ये आबदारखाने सिर्फ पानी पिलाने की जगह नहीं थे, बल्कि सामाजिक सौहार्द और इंसानियत की मिसाल भी माने जाते थे. गर्मी के दिनों में मुसाफिरों और राहगीरों को यहां ठंडा पानी और शरबत उपलब्ध कराया जाता था.
वक्त के साथ तकनीक बदली और पानी की व्यवस्था के तरीके भी बदल गए. नलों, बोरवेल और प्लास्टिक की बोतलों के बढ़ते इस्तेमाल के कारण आबदारखानों की ऐतिहासिक इमारतें धीरे-धीरे गायब होने लगीं. शहर के कई पुराने कुएं और बावड़ियां या तो सूख गईं या उन पर निर्माण कार्य हो गया. आज वाटर फिल्टर प्लांट और 20 लीटर के पानी के कैन का चलन तेजी से बढ़ चुका है. इसके चलते मिट्टी के घड़ों और पारंपरिक प्याऊ की वह सोंधी ठंडक अब धीरे-धीरे इतिहास का हिस्सा बनती जा रही है, जिसे कभी लोग गर्मी में राहत का सबसे बड़ा सहारा मानते थे.
आबदारखानों की सबसे खास बात उनका प्राकृतिक रेफ्रिजरेशन सिस्टम था, जो बिना किसी आधुनिक तकनीक के पानी को ठंडा रखता था. जमीन पर रेती बिछाकर उस पर मिट्टी के बड़े-बड़े रंजन यानी घड़े रखे जाते थे. ठंडक बनाए रखने के लिए रेती पर चिड़ियों का दाना डाला जाता था, जो पानी के रिसाव से अंकुरित होकर छोटी-छोटी घास बन जाता था. यह गीली घास और मिट्टी के घड़े मिलकर पानी को बेहद ठंडा और ताजा बनाए रखते थे. माना जाता था कि इस तरीके से रखा पानी फ्रिज के पानी से ज्यादा ठंडा, स्वादिष्ट और स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता था.
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