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ईरान युद्ध जब तेल की कीमतों में लगी आग, तब उसी से अकूत धन कूट रहे ये दो देश

ईरान युद्ध का साया पिछले दो महीनों से दुनिया पर मंडरा रहा है. अच्छीखासी चलती हुई दुनिया के हर देश में तेल के दाम बढ़ गए हैं और हर चीज की कीमतों में आग लग रही है. ऐसे में दुनिया के दो देश ऐसे हैं, जो तेल बेचकर अकूत धन कूट रहे हैं.

ईरान युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला दिया है. ब्रेंट क्रूड $72 से उछलकर $120 प्रति बैरल तक पहुंच गया. इस वैश्विक तबाही में दो देश हैं जो तेल से जमकर पैसा कूट रहे हैं. ये दोनों देश हैं – रूस और वेनेजुएला. दोनों की कहानी अलग-अलग है, लेकिन दोनों का फायदा एक ही वजह से हुआ – वे तेल बेचने वाले हैं, खरीदने वाले नहीं.

रूसी तेल में 60 फीसदी की उछाल

रूस के उरल्स तेल की निर्यात कीमत मई 2026 में $94.87 प्रति बैरल तक पहुंची, जो अक्टूबर 2023 के बाद सबसे ज्यादा है. यह पिछले महीने से 18% और एक साल पहले की तुलना में 60% अधिक है.

मार्च 2026 में रूस का तेल निर्यात राजस्व एक महीने में $9.3 अरब बढ़कर $19 अरब हो गया यानी करीब दोगुना. कच्चे तेल से $5.4 अरब और तेल उत्पादों से $3.9 अरब की अतिरिक्त कमाई हुई. इस कमाई से पुतिन ने अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में वे कटौतियां टाल दीं जो यूक्रेन युद्ध के कारण उनके लिए जरूरी लगने लगी थीं लेकिन ये अलोकप्रिय साबित होतीं.

रूस के ‘शैडो फ्लीट’ का खेल

जब तक ईरान युद्ध शुरू नहीं हुआ था, तब तक रूस पर अमेरिका और पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगा रखे थे. इनसे बचने के लिए रूस ने एक ‘शैडो फ्लीट’ तैयार किया. ये ऐसे पुराने टैंकर हैं जिनका बीमा या रजिस्ट्रेशन पश्चिमी कंपनियों के पास नहीं है. रूस इनके जरिए भारत और चीन जैसे बड़े देशों को भारी मात्रा में तेल सप्लाई कर रहा है.

बीच में जब अमेरिका ने उसके तेल बेचने पर लगे प्रतिबंध को खत्म किया तो उसने जमकर तेल बेचे. रूस ने अपने डिस्काउंट को कम कर दिया. यानी अब वह पहले से कहीं ज्यादा कीमत पर तेल बेच रहा है. अब अमेरिका ने दोबारा से रूस पर लगे प्रतिबंधों को बहाल करने की घोषणा कर दी है तो ऐसा लगता है कि रूस अपने तेल को सस्ता करेगा और शैडो फ्लीट्स के जरिए भारत, चीन को भेजेगा. चीनी और भारतीय रिफाइनरियां रूसी ‘उरल्स’ क्रूड की सबसे बड़ी खरीदार बनी हुई हैं.

वेनेजुएला की भी चांदी हो गई

वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों और खराब मैनेजमेंट के कारण उसका प्रोडक्शन ठप पड़ा था. ईरान संकट ने पासा पलट दिया.

मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ते ही अमेरिका को समझ आ गया कि अगर ग्लोबल मार्केट में तेल की कमी हुई, तो उसके अपने देश में महंगाई बढ़ जाएगी. इसलिए अमेरिका ने मजबूरी में वेनेजुएला पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी. अमेरिकी तेल कंपनी शेवरॉन को वहां से तेल निकालने और एक्सपोर्ट करने की इजाजत दे दी. वेनेजुएला का तेल भारी होता है, जिसकी मांग अमेरिकी रिफाइनरियों में बहुत ज्यादा है.

वेनेजुएला का तेल उत्पादन जो कभी गिरकर 3-4 लाख बैरल प्रति दिन पर आ गया था, वह अब 9 लाख बैरल प्रति दिन के पार पहुंच रहा है. बढ़ी हुई कीमतों और अमेरिकी डॉलर में सीधे भुगतान मिलने से वेनेजुएला के खाली खजाने में अचानक भारी नकदी आई है, जिससे उसकी टूटती अर्थव्यवस्था को बड़ा सहारा मिला है.

वेनेजुएला में दशकों से तेल को राष्ट्रीय संपत्ति मानकर इसे नागरिकों को करीब मुफ्त में दिया जाता रहा है, ये एक राजनीतिक परंपरा है. अब जब वैश्विक कीमतें $100-$120 पर हैं, तो सरकार की निर्यात से कमाई इतनी ज्यादा है कि घरेलू सब्सिडी जारी रखना आसान हो गया.

तेल के राजाओं का अब क्या हाल

जो देश पारंपरिक रूप से तेल के राजा माने जाते हैं, जैसे सऊदी अरब, यूएई, और कुवैत, उनकी स्थिति इस बार थोड़ी पेचीदा और अलग है. ये देश ओपेक संगठन का हिस्सा हैं. इन देशों ने अपने उत्पादन में भारी कटौती कर रखी है. कीमतें तो ऊंची हैं, लेकिन चूंकि ये देश बाजार में तेल कम बेच रहे हैं, इसलिए इन्हें उतना मुनाफा नहीं मिल पा रहा है जितना मिलना चाहिए था. इनका मार्केट शेयर अब रूस और अमेरिका जैसे देश छीन रहे हैं.

हकीकत ये है कि सऊदी अरब और यूएई इस समय तेल की ऊंची कीमतों से खुश तो हैं, लेकिन वे डरे हुए भी हैं. अगर ईरान युद्ध और भड़का और जलडमरूमध्य ब्लॉक हो गया, तो खाड़ी देशों का तेल दुनिया तक पहुंच ही नहीं पाएगा. इसके अलावा यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा उनके तेल टैंकरों और रिफाइनरियों पर हमलों का खतरा हमेशा बना रहता है.

पारंपरिक देशों के इतर अमेरिका इस समय दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक बन बैठा है. वह रिकॉर्ड तोड़ मात्रा में ‘शेल ऑयल’ निकाल रहा है. ऊंची कीमतों पर यूरोप और एशिया को बेचकर सबसे ज्यादा मुनाफा कूट रहा है.

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