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पश्चिम बंगाल में उखड़ने लगे TMC के तंबू, क्लबों से हटे ममता से सटे रहने के सबूत! TMC दफ्तरों पर अब भाजपा का कब्जा

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बंगाल में उखड़े TMC के तंबू, क्लबों से हटे ममता से करीबी के सबूत! भगवाकरण शुरू

Last Updated:May 08, 2026, 21:11 IST

4 मई 2026 की सुबह ममता बनर्जी और उनकी पार्टी टीएमसी के लिए ठीक वैसी ही साबित हुई जैसी 15 साल पहले 13 मई 2011 को वाम मोर्चा के लिए सिद्ध हुई थी. तब भी हर मुहल्ले में खुले क्लबों के बोर्ड रातोंरात बदल गए थे. यहां तक कि वाम के दफ्तर और क्लबों के रंग भी बदल दिए गए थे. वाम दलों के ज्यादातर कैडर तो सत्ता परिवर्तन के साथ ही बिलों में ही दुबक गए थे. सीपीएम की लोकल कमेटियों में बैठने तक को कोई तैयार नहीं होता था. ममता की सत्ता जाने पर टीएमसी के साथ भी वहीं सलूक दोहराया जा रहा है. बंगाल में उखड़े TMC के तंबू, क्लबों से हटे ममता से करीबी के सबूत! भगवाकरण शुरूZoomममता बनर्जी 15 साल तक पश्चिम बंगाल की सीएम रही.

वर्ष 2011 की मतगणना का दिन जिन्होंने बंगाल में गुजारा हो, उन्हें जरूर मालूम होगा कि वहां चुनाव के तरीके और नतीजों के बाद के हालात कैसे थे. इधर ममता के सत्ता में आने की मुनादी हो रही थी और उधर वाम के जाल में वर्षों से फंसे युवा और बेरोजगार क्लबों के नाम पट्ट बदलने में मशगूल थे. अगली सुबह आम आदमी की जुबान पर वाम दलों की बात चर्चा में आती भी थी तो सिर्फ उसकी आलोचना के लिए. इन युवाओं के पोषक-संरक्षक प्रमोटर, ठेकेदार, दलाल और डीलर ही अधिक थे. वे सत्तासीन वाम मोर्चा के घटक दलों से संबद्ध थे. खासकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPM) से, जो वाम मोर्चा की अग्रणी पार्टी थी. ज्योति बसु जैसे दिग्गज सीपीएम के नेता थे. वे बंगाल के सीएम भी थे. विमान बोस के हाथ में वाम मोर्चा की कमान थी. बुद्धदेव भट्टाार्य जैसा प्रगतिशील व्यक्तित्व भी सीपीएम के साथ था. सत्ता गई तो साथ भी सबने छोड़ दिया था. ठीक वैसे ही, जैसे चुनाव नतीजे आने के साथ ही क्लबों ने अपना कायाकल्प करना शुरू कर दिया है. अब टीएमसी द्वारा संचालित क्लबों में भाजपा के सपोर्टर बैठेंगे.

लेफ्ट का भी साथ ऐसे ही छोड़ा सीपीएम संग जुड़ने का बड़ा फायदा तो यह था कि वाम मोर्चा के घटक दलों पर ऐसे लोग अपना दबदबा बनाए रख सकें. सरकार में उसका वर्चस्व होने से सरकारी मदद मिलने में भी सहूलियत होती थी. साथ रहते ऐसे लोगों को कम से कम अपने पाड़ा (मुहल्ला) का दादा बनने का तो सौभाग्य मिल ही जाता. धंधा-पानी भी सही से चलता रहता. हां, इस रिश्ते की एक बात मार्के की थी. इसमें विश्वास की कोई गुंजाइश ही नहीं थी. सब कुछ परस्पर स्वार्थ पर टिका था. इसीलिए सत्ता बदलते ही ऐसे लोग मिनटों में बदल गए. वाम के प्रति निष्ठा (लायल्टी) अधिकतम एक रात तक ही टिक पाई. अगली सुबह से वाम का ‘लाल’ टीएमसी के ‘सबुज (हरा) में बदल गया. क्लबों से लाल से लगाव के सबूत आनन-फानन मिटा दिए गए. ममता ने भी उन्हीं कथित कैडरों को साथ जोड़ा, जो उनके साथ भी अब वही कर रहे हैं, जो वे वाम दलों के साथ कर चुके थे. ममता ने भी सत्ता मिलने पर वाम का ही तरीका अपनाया, जिससे मुक्ति की चाह में लोगों ने उन्हें सत्ता सौंपी थी.

उम्मीदों के विपरीत काम किएबंगाल की जनता ने बड़ी उम्मीदों के साथ ममता को सत्ता सौंपी थी. पर, ममता ने वही किया, जो पूर्ववर्ती वाम मोर्चा की सरकार ने भी किया था. कुछ मामले में तो ममता वामपंथियों से भी क्रूर निकलीं. वाम दलों के बड़े नेता (विधायक-सांसद) भ्रष्टाचार के आरोपों से बचे रहे. ममता ने अपने नेताओं को भ्रष्टाचार की खुली छूट दे दी थी. पार्थ चटर्जी से शुरू हुआ भ्रष्टाचार उजागर होने का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा था. टीएमसी के पार्षदों तक ने भ्रष्टाचार की बहती गंगा में हाथ धोने का सिलसिला चालू रखा. ईडी, सीबीआई जैसी केंद्रीय एजेंसियों को टीएमसी के ऐसे ही नेताओं ने बंगाल में पैर जमाने का मौका दे दिया. हर काम के लिए नीचे से ऊपर तक पैसे वसूले जाने लगे. भाजपा के लोग तो यह भी आरोप लगाते हैं कि भ्रष्टाचार की कमाई का एक हिस्सा ऊपर तक पहुंचता था. ममता ने जनता की भावनाओं को किनारे कर दिया और बंगाल को अपना स्थायी राज समझ लिया. पर, पब्लिक सब देखती है. आखिरकार पब्लिक ने मौका पाकर ममता को उनकी गलती का एहसास करा ही दिया.

TMC सपोर्टर अब भगवाधारी4 मई 2026 की सुबह ममता और उनकी पार्टी टीएमसी के लिए ठीक वैसी ही साबित हुई, जैसी 15 साल पहले 13 मई 2011 को वाम मोर्चा के लिए सिद्ध हुई थी. तब भी हर मुहल्ले में खुले क्लबों के बोर्ड रातोंरात बदल गए थे. यहां तक कि वाम के दफ्तर और क्लबों के रंग भी बदल दिए गए थे. वाम दलों के ज्यादातर कैडर तो सत्ता परिवर्तन के साथ ही बिलों में ही दुबक गए थे. सीपीएम की लोकल कमेटियों में बैठने तक को कोई तैयार नहीं होता था. ममता जब सत्ता में आईं तो ये सभी उनकी ओर शिफ्ट हो गए. ममता ने भी लेफ्ट की ही राह चुनी. पाड़ा से पार्टी के प्रांतीय कार्यालय तक हाट लाइन कनेक्शन का ममता ने चेन बनाया. दादागीरी का पैटर्न ममता ने भी बरकरार रखा. स्वार्थ की बुनियाद पर जो तब ममता के सपोर्टर थे, अब स्वार्थ सिद्धि के लिए भगवा रंग में रंग जाएंगे. इसकी शुरुआत नतीजे आने के पहले ही हो चुकी है. यह बंगाल की पुरानी परिपाटी रही है.

भाजपा के राज में बदलाव संभव!बंगाल अब भगवामय हो चुका है. 15 साल बाद यह परिवर्तन हुआ है. इसलिए बदलाव की अब उम्मीद की जा सकती है. भाजपा से मुसलमानों ने अगर सामने के 5 साल में कोई भय महसूस नहीं किया तो उनकी भी निष्ठा बदल सकती है. बंगाल के मुसलमान दूसरे राज्यों के कट्टरपंथियों से कहीं ज्यादा समझदार और मन-मिजाज से उदार हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चाय बागानों के लिए स्पेशल स्कीम का वादा किया है. उसी तरह भाजपा बंद पड़ी जूट मिलों को ही चालू करा दे तो बंगाल का बड़ा उपकार होगा, साथ ही सत्ता में आगे भी उसके बने रहने की संभावना सुरक्षित हो जाएगी. बंगाल में वाम मोर्चा के शासन काल से ही बदले की संस्कृति राजनीति में हावी रही है. भाजपा इसमें बदलाव जरूर करेगी. जिस तरह भाजपा नेतृत्व बदले की कार्रवाई से बचने की सलाह देता रहा है और कुछ जगहों पर सख्ती भी शुरू हुई है, उससे बदलाव की संभावना प्रबल है. भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की भी सलाह है कि बदलाव को बदले की संस्कृति सपोर्रटर न बनाएं. ऐसा करने में भाजपा की बनने जा रही नई सरकार कामयाब हो जाती है तो यह बंगाल की सियासी संस्कृति में बड़ा परिवर्तन माना जाएगा.

About the Authorओमप्रकाश अश्क

प्रभात खबर, हिंदुस्तान और राष्ट्रीय सहारा में संपादक रहे. खांटी भोजपुरी अंचल सीवान के मूल निवासी अश्क जी को बिहार, बंगाल, असम और झारखंड के अखबारों में चार दशक तक हिंदी पत्रकारिता के बाद भी भोजपुरी के मिठास ने ब…और पढ़ें

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