World

जहां रूस-चीन का चलता था सिक्का, वहां अब ब्रिटेन क्यों जमा रहा पांव? मिडिल एशिया में मची है गजब हलचल

महाशक्‍त‍ियों की नजर इस वक्‍त एश‍िया पर है. न‍िशाने पर है मध्‍य एश‍िया का वो इलाका, जहां कभी रूस का स‍िक्‍का चला करता था. कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान… ये वो पांच देश हैं, ज‍िन्‍हें पांच तान कहा जाता है. ब्र‍िटेन की द‍िलचस्‍पी कभी इस इलाके की ओर नहीं रही. लेकिन अचानक ऐसा क्‍या हुआ क‍ि ब्र‍िटेन इन देशों में पूरी ताकत से पांव जमाने की कोश‍िश कर रहा है.

किस्सा शुरू होता है 90 के दशक से. 1991 में सोवियत संघ टूटा और ये पांचों देश आजाद हो गए. लेकिन ब्रिटेन ने इनमें कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई. लंदन के बाबू लोग तब भी इस इलाके को रूस का पिछवाड़ा ही मानते थे. इतिहासकार इसे 19वीं सदी के मशहूर ‘ग्रेट गेम’ से भी जोड़कर देखते हैं, जब मध्य एशिया पर कब्जे के लिए ब्रिटिश साम्राज्य और रूसी साम्राज्य के बीच शह-मात का खेल चला था, जिसमें ब्रिटेन को मुंह की खानी पड़ी थी. पिछले बीस सालों में अफगानिस्तान के चलते पश्चिमी देशों ने इस इलाके का थोड़ा बहुत इस्तेमाल किया, लेकिन 2021 में काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद वह रिश्ता भी लगभग ठंडा पड़ गया. ब्रिटेन की अपनी ही संसदीय समिति ने हाल ही में माना कि मध्य एशिया को लेकर ब्रिटेन की नीतियां “बेहद घटिया” और बिना विजन वाली रही हैं.

अब अचानक ब्रिटेन को क्यों आई इन देशों की याद?

यूरोपीय यूनियनसे बाहर निकलने के बाद ब्रिटेन के व्यापार को तगड़ा झटका लगा है. उसे नए बाजार चाहिए. इसलिए उसने डेवलपिंग कंट्रीज ट्रेड फैसिलिटी नाम की एक नई जुगाड़ निकाली. इसके तहत उज्बेकिस्तान को यह छूट दे दी गई कि वह अपने हजारों उत्पाद बिना किसी टैक्स के ब्रिटेन में बेच सकता है.

इसके अलावा, यूरोप से आना बंद हुए मजदूरों की कमी ब्रिटेन को खल रही है. खेतों में काम करने के लिए ब्रिटेन ने मध्य एशिया के लोगों के लिए वीजा के नियम आसान कर दिए. पिछले कुछ सालों में ही मध्य एशिया से करीब 10,000 लोग मौसमी मजदूर बनकर ब्रिटेन पहुंचे हैं. अब तो मांग उठ रही है कि सिर्फ खेतों के लिए ही नहीं, बल्कि प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन और नर्सों को भी वहां से बुलाया जाए.

लिथियम और यूरेनियम जैसे खजाने की तलाश

असली खेल खनिजों का है. भविष्य ग्रीन एनर्जी और इलेक्ट्रिक कारों का है. इसके लिए लिथियम, यूरेनियम और रेयर अर्थ धातुओं की सख्त जरूरत है. मध्य एशिया की जमीन के नीचे इन खनिजों का अथाह भंडार दबा पड़ा है. अभी इन चीजों के लिए दुनिया चीन पर निर्भर है. अमेरिका और ब्रिटेन दोनों चाहते हैं कि चीन का यह एकाधिकार टूटे. इसलिए ब्रिटेन यहां एक भरोसेमंद सप्लाई चेन बनाना चाहता है.

सॉफ्ट पावर का इस्‍तेमाल

ब्रिटेन को पता है कि वह सीधे पैसे या हथियारों के दम पर रूस-चीन से नहीं भिड़ सकता. इसलिए वह अपनी सॉफ्ट पावर का इस्तेमाल कर रहा है. मध्य एशिया में ब्रिटिश यूनिवर्सिटियों का बहुत रुतबा है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगर आप किसी देश को ब्रिटिश कल्चर और शिक्षा से जोड़ देते हैं, तो वहां ब्रिटेन के साथ व्यापार करने की इच्छा 7% तक बढ़ जाती है. इसी के दम पर ब्रिटेन रेलवे, एयरपोर्ट और माइनिंग के प्रोजेक्ट्स में हाथ आजमा रहा है.

कहानी में ट्विस्ट

ब्रिटेन के लिए यह रास्ता इतना आसान नहीं है. मध्य एशिया के ये पांचों देश पक्के तानाशाह हैं. मानवाधिकार के मामले में इनकी हालत बहुत खस्ता है. फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट इन्हें स्वतंत्र नहीं मानती है. यहां चुनाव बस नाम के होते हैं, विरोध करने वालों को कुचल दिया जाता है और मीडिया पर सख्त पहरा है. रूस और चीन को इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता. वो जाते हैं, बिजनेस डील करते हैं और बिना कोई ‘नैतिक ज्ञान’ दिए वापस आ जाते हैं. लेकिन ब्रिटेन के लिए यह बड़ा सिरदर्द है. अगर वह व्यापार के लिए मानवाधिकारों पर आंखें मूंदता है, तो घर में उसकी थू-थू होती है.

क्या मध्य एशिया के नेता ब्रिटेन की बात सुनेंगे?यह एक बड़ा सवाल है. खासकर तब जब ब्रिटेन ने अपने विदेशी सहायता बजट में भारी कटौती कर दी है. एक समय था जब ब्रिटेन अकेले ताजिकिस्तान को हर साल 15-20 मिलियन पाउंड की मदद देता था. अब पूरे मध्य एशिया के लिए 2024-2025 का बजट घटाकर मात्र 12.7 मिलियन पाउंड कर दिया गया है. ऐसे में जब चीन और रूस अरबों डॉलर का निवेश कर रहे हों, तो चंद लाख पाउंड देकर ब्रिटेन का वहां अपना ‘मूल्यों’ वाला ज्ञान बांटना कितना सफल होगा, यह देखना दिलचस्प होगा!

Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Uh oh. Looks like you're using an ad blocker.

We charge advertisers instead of our audience. Please whitelist our site to show your support for Nirala Samaj