क्यों साउथ कोरिया में है गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का खास सम्मान, स्कूलों में पढ़ाते हैं उनकी कविता

कोरिया के लोग गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का बहुत सम्मान करते हैं. उन्होंने कोरिया के लिए एक ऐसी कविता लिखी थी कि कोरिया के लोग उनके मुरीद हो गए. इस देश में उन्हें खास सम्मान दिया जाता रहा है. अब भी वहां के स्कूलों में टैगोर की वो कविता पढ़ाई जाती है, जो उन्होंने इस देश के सम्मान में तब लिखी थी, जब वो जापानी शासन के अधीन था.
टैगोर औऱ साउथ कोरिया के बीच रिश्ता वाकई बहुत गहरा और भावनात्मक है. ये 1929 की बात है. तब कोरिया जापानी शासन के अधीन था. जापान का ये शासन कोरियाई लोगों के लिए बहुत कष्टकर था, क्योंकि उन्हें दासता में रहना पड़ रहा था. हालांकि यही हालत तब भारत की भी थी, वह ब्रिटेन के औपनिवेशिक शासन के अधीन आजादी की लड़ाई लड़ रहा था.
हालांकि टैगोर कभी व्यक्तिगत रूप से कोरिया की भूमि पर नहीं गए. 1916, 1924 और 1929 की अपनी जापान यात्राओं के दौरान उन्होंने कोरिया जाने की इच्छा जताई थी, लेकिन खराब स्वास्थ्य और जापानी प्रशासन की कड़ी निगरानी के कारण वे वहां नहीं पहुंच सके. हालांकि उनका वहां नहीं जाना भी उनके प्रति कोरियाई लोगों के सम्मान को कम नहीं कर सका.
तब टैगोर ने कोरियाई लोगों के लिए कविता लिखी
1929 में जब टैगोर जापान में थे, तब कोरिया के एक प्रमुख समाचार पत्र ‘डोंग-ए इल्बो’ के संवाददाताओं ने उनसे मुलाकात की. टैगोर को 1913 में गीतांजलि के लिए नोबल पुरस्कार मिल चुका था, लिहाजा एशिया में उनकी ख्याति और लोकप्रियता दोनों काफी ज्यादा थीं. जब कोरियाई अखबार के संवाददाताओं ने उनसे मुलाकात तो कोरियाई लोगों के लिए एक संदेश देने का अनुरोध किया.
साउथ कोरिया में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर को खास सम्मान और प्यार हासिल है. उनकी एक कविता वहां से स्कूलों में बच्चों को पढ़ाई जाती है. ( ai image)
टैगोर ने तब चार पंक्तियों की एक छोटी सी कविता सिजो शैली में लिख कर दी, जिसने सोए हुए कोरिया में राष्ट्रवाद की ज्वाला जला दी,
“एशिया के स्वर्ण युग मेंकोरिया इसके उज्ज्वल दीपों में एक था… और वो दीया फिर से प्रज्जवलित होने की प्रतीक्षा कर रहा हैताकि पूर्व को आलोकित कर सके.”
जो कोरिया के जन जन में छा गई
ये कविता कोरियाई लोगों के लिए केवल साहित्य नहीं, बल्कि एक राजनीतिक भविष्यवाणी बन गई कि वे फिर से अपनी खोई हुई गरिमा प्राप्त करेंगे. इस कविता ने साउथ कोरिया में नई चेतना और जोश का संचार किया. इसे वहां के स्कूलों में छात्रों को पढ़ाया भी जाता है. दक्षिण कोरियाई बच्चे आज भी उनकी कविता ‘द लैंप ऑफ द ईस्ट’ को जुबानी याद रखते हैं
कोरिया पर जापानी कब्जे की निंदा की
कोरियाई लोग टैगोर को केवल एक कवि नहीं, बल्कि एक ‘आध्यात्मिक गुरु’ और ‘मुक्तिदाता’ की तरह देखते थे. वह पहले वैश्विक स्तर के व्यक्ति थे जिन्होंने खुलकर कोरिया पर जापानी कब्जे की निंदा की. टैगोर ने कोरियाई लोगों को याद दिलाया कि उनका इतिहास गौरवशाली है, जिसे जापानी मिटाने की कोशिश कर रहे थे. टैगोर के विचार वहां के स्वतंत्रता सेनानियों के लिए एक नैतिक बल बन गए.
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के नाम पर साउथ कोरिया में एक सोसायटी भी है, जिसके जरिए वहां की भाषा में उनके साहित्य का अनुवाद हुआ है. ( ai image)
टैगोर के सबसे करीबी कोरियाई मित्रों में चोई नाम-सोन का नाम प्रमुख है, जो कोरिया के एक महान विद्वान और स्वतंत्रता सेनानी थे. चोई नाम-सोन ने ही टैगोर के विचारों को कोरियाई भाषा में अनुवादित किया.
कोरिया के एक और प्रसिद्ध कवि हान योंग-उन, जो एक बौद्ध भिक्षु भी थे, वो टैगोर की कविताओं और दर्शन से बहुत प्रभावित थे. उनकी प्रसिद्ध कृति ‘लवर्स साइलेंस’ पर टैगोर की ‘गीतांजलि’ की स्पष्ट छाप देखी जा सकती है. वैसे टैगोर के काम का कोरियाई भाषा में खूब अनुवाद हुआ है.
सियोल में टैगोर की कांस्य प्रतिमा
आज भी दक्षिण कोरिया टैगोर को अपने इतिहास का हिस्सा मानता है. दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल के ‘ड्रेगन हिल’ क्षेत्र में टैगोर की एक कांस्य प्रतिमा स्थापित है. इसका अनावरण 2011 में किया गया था. कोरिया में एक सक्रिय ‘टैगोर सोसाइटी’ है जो उनके साहित्य पर शोध और चर्चा आयोजित करती है. वहां के कई विश्वविद्यालयों के साहित्य पाठ्यक्रम में टैगोर को अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाता है.
एक तथ्य ये भी है कि 1934 में जब बंगाल में भीषण बाढ़ आई, तब कोरियाई लोगों ने अपनी गरीबी और गुलामी के बावजूद टैगोर को राहत कार्यों के लिए पैसे भेजे. ये दिखाता है कि रिश्ता केवल शब्दों का नहीं, बल्कि संवेदनाओं का भी था.
शांतिनिकेतन और साउथ कोरिया में रिश्ता
शांतिनिकेतन और दक्षिण कोरिया के बीच का संबंध केवल किताबी नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत सांस्कृतिक सेतु जैसा है. शांतिनिकेतन में विभिन्न देशों की संस्कृति के अध्ययन के लिए अलग-अलग ‘भवन’ हैं. हाल के वर्षों में दक्षिण कोरिया और विश्वभारती के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ है, जिसके तहत शांतिनिकेतन में ‘कोरिया भवन’ स्थापित करने की योजना पर काम चल रहा है. यह केंद्र कोरियाई भाषा, साहित्य और संस्कृति के अध्ययन का मुख्य अड्डा बनेगा.
इसकी संस्थापक किम यांग-शिक दक्षिण कोरिया की प्रसिद्ध कवयित्री ने अपना पूरा जीवन टैगोर के साहित्य को कोरियाई भाषा में अनुवाद करने में लगा दिया. उन्होंने न केवल शांतिनिकेतन की कई बार यात्रा की, बल्कि वहां ‘कोरिया भवन’ के निर्माण के लिए निजी तौर पर बड़ी धनराशि भी दान की. उनके इस योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया था.
शांतिनिकेतन का ‘कला भवन’ हमेशा से दक्षिण कोरियाई कलाकारों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है. कई कोरियाई छात्र और शोधकर्ता शांतिनिकेतन शैली की पेंटिंग और मूर्तिकला सीखने बंगाल आते हैं. कोरियाई कलाकारों का मानना है कि टैगोर की कला दृष्टि और कोरिया की पारंपरिक कला में एक जैसी आध्यात्मिकता और सरलता है.
विश्वभारती विश्वविद्यालय और दक्षिण कोरिया के प्रमुख विश्वविद्यालयों जैसे सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी के बीच छात्र विनिमय कार्यक्रम चलते हैं. दक्षिण कोरियाई सरकार शांतिनिकेतन के छात्रों को कोरियाई भाषा सीखने के लिए विशेष स्कॉलरशिप भी देती है.



