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क्या अपनी ही कब्र खोद रहा ऑस्ट्रेलिया? अमेरिका के बढ़ते एयरबेस कहीं ले न डूबें!

ऑस्ट्रेलिया के ब्रिस्बेन के आसमान में एक विशाल अमेरिकी बी-2 स्टील्थ बॉम्बर दिखाई देता है. बारिश से भीगी सुबह में यह परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम विमान ऑस्ट्रेलिया के एक अहम अमेरिकी सहयोगी सैन्य अड्डे पर उतरता है. विमान के इंजन बंद भी नहीं होते. तेजी से ईंधन भरा जाता है और सूरज निकलने से पहले ही बी-2 दोबारा आसमान में गायब हो जाता है.

यह सिर्फ एक विमान की कहानी नहीं है. यह ऑस्ट्रेलिया में बढ़ती अमेरिकी सैन्य मौजूदगी की उस तस्वीर का हिस्सा है, जिसने अब कई सवाल खड़े कर दिए हैं. इसी के साथ वो चिंताएं भी बढ़ गई हैं, जो देश को बर्बादी की तरफ ले जा सकती है.

ब्रिस्बेन से करीब 50 किलोमीटर दूर आरएएएफ बेस एम्बरली अमेरिका के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सैन्य अभियानों का एक अहम केंद्र बन चुका है. लेकिन ऑस्ट्रेलिया में अमेरिकी सैन्य पहुंच सिर्फ इसी बेस तक सीमित नहीं है. ऑस्ट्रेलिया के अलग-अलग हिस्सों में अमेरिकी सेना की मौजूदगी इतनी बढ़ चुकी है कि कुछ विशेषज्ञ इसे सैचुरेशन यानी पूरे देश में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी का फैलाव तक कह रहे हैं.

ऑस्ट्रेलिया की जमीन पर अमेरिकी सैन्य नेटवर्क

एक नए डेटा के मुताबिक अमेरिकी सेना और अमेरिकी रक्षा कंपनियों का ऑस्ट्रेलिया में 110 सैन्य ठिकानों पर नियंत्रण है. इनमें से 17 ठिकानों को अमेरिकी सेना सीधे नियंत्रित करती है, जबकि 75 ऑस्ट्रेलियाई सैन्य ठिकानों तक अमेरिकी सेना की पहुंच है. इसके अलावा 18 और सैन्य ठिकानों तक अमेरिकी रक्षा कंपनियों की पहुंच है. यानी ऑस्ट्रेलिया के आधे से ज्यादा सैन्य ठिकानों में किसी न किसी रूप में अमेरिका की मौजूदगी है.

कहीं बी-52 उतरने की तैयारी

ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी हिस्से में स्थित आरएएएफ बेस टिंडल का रनवे बढ़ाया जा रहा है. वजह है यहां बड़े अमेरिकी बी-52 बॉम्बर विमानों को आसानी से उतारना. बी-52 ऐसे विमान हैं जो परमाणु हथियार ले जा सकते हैं.

सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर ये विमान ऑस्ट्रेलियाई जमीन पर परमाणु हथियार लेकर आते हैं तो इसकी जानकारी किसे होगी? अमेरिकी सरकार यह बताने को तैयार नहीं है कि उसके विमान कब परमाणु हथियार लेकर ऑस्ट्रेलिया आते हैं. वहीं ऑस्ट्रेलियाई सरकार भी इस बारे में सवाल नहीं पूछती.

ऑस्ट्रेलिया की जमीन से दुनिया पर नजर

ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट पर भी अमेरिका और उसके सहयोगियों का एक बेहद अहम सैन्य नेटवर्क मौजूद है. यहां डीप स्पेस रडार, स्पेस सर्विलांस टेलीस्कोप और हेरोल्ड होल्ट नेवल कम्युनिकेशन स्टेशन जैसी तकनीकी सुविधाएं हैं.

हेरोल्ड होल्ट स्टेशन की एंटीना प्रणाली बेहद कम फ्रीक्वेंसी वाली रेडियो तरंगों का इस्तेमाल करती है. इनके जरिए समुद्र के अंदर मौजूद पनडुब्बियों से संपर्क किया जा सकता है. यानी ऑस्ट्रेलिया की जमीन सिर्फ सैन्य विमानों और सैनिकों के लिए इस्तेमाल नहीं हो रही. ये अंतरिक्ष, पनडुब्बी और खुफिया अभियानों के लिए भी अहम केंद्र बन चुकी है.

युद्ध हुआ तो ऑस्ट्रेलिया कितना सुरक्षित?

यहीं से सबसे बड़ा सवाल उठता है. अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बीच रक्षा सहयोग लगातार गहरा हो रहा है. ऑस्ट्रेलिया में अमेरिकी हथियार, ईंधन और सैन्य वाहन पहले से रखे जा रहे हैं. इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में युद्ध की स्थिति पैदा होने पर उन्हें तेजी से इस्तेमाल किया जा सके. वोडोंगा के बैंडियाना बेस पर भी अमेरिकी हथियार, गोला-बारूद, ईंधन और सैन्य वाहन रखने की प्लानिंग है.

उत्तरी क्षेत्र में हजारों अमेरिकी मरीन लगातार ट्रेनिंग लेते हैं. आने वाले समय में पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के पास स्थित एचएमएएस स्टर्लिंग पनडुब्बी अड्डे से भी बड़ी संख्या में अमेरिकी सैन्यकर्मी काम करेंगे. सरकार इसे अमेरिकी बेस नहीं, बल्कि सैनिकों की रोटेशन कहती है. लेकिन सवाल है कि नाम चाहे जो हो, इसका रणनीतिक मतलब आखिर कितना अलग है?

चीन के साथ युद्ध हुआ तो?

यही वह सवाल है जिसने ऑस्ट्रेलिया में बहस को और तेज कर दिया है. अमेरिका एक दशक से ज्यादा समय से ऑस्ट्रेलिया को चीन के साथ संभावित युद्ध के लिए अपनी सैन्य रणनीति में अहम जगह के तौर पर तैयार कर रहा है.

अमेरिका के लिए ऑस्ट्रेलिया सिर्फ एक सहयोगी देश नहीं, बल्कि चीन के खिलाफ सैन्य अभियान के लिए बेहद अहम रणनीतिक ठिकाना है. चीन की नजर में ऑस्ट्रेलिया अब सिर्फ अमेरिकी सेना को अपनी जमीन देने वाला देश नहीं रह गया है. बल्कि ऑस्ट्रेलिया खुद अमेरिकी युद्ध मशीन का एक अहम हिस्सा बनता जा रहा है.

अमेरिका-चीन में तनाव हुआ तो क्या?

यहीं से ऑस्ट्रेलिया के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या अमेरिका के साथ बढ़ता सैन्य गठजोड़ ऑस्ट्रेलिया की सुरक्षा मजबूत कर रहा है? या फिर अगर भविष्य में अमेरिका और चीन के बीच बड़ा युद्ध छिड़ता है, तो अमेरिकी सैन्य ठिकानों की वजह से ऑस्ट्रेलिया भी सीधे उस संघर्ष का हिस्सा बन सकता है?

ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बीच ऑकस जैसे रक्षा समझौते इस साझेदारी को लगातार मजबूत कर रहे हैं. लेकिन आलोचकों का कहना है कि इस प्रक्रिया में ऑस्ट्रेलिया की स्वतंत्र रणनीतिक नीति धीरे-धीरे कमजोर हो रही है.  इसे ऑस्ट्रेलिया की एक बड़ी संस्थागत नाकामी बताते हैं. उनके मुताबिक देश की राजनीति, संसद और नौकरशाही अमेरिकी सैन्य मौजूदगी पर इतने सवाल पूछने की आदी ही नहीं रही.

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