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851रनों से हारी टीम, बना वर्ल्ड रिकॉर्ड जो आज भी बरकरार, पहली जीत के लिए लग गए 20 साल, 52 साल पहले खेला गया मैच

Last Updated:April 29, 2026, 14:21 IST

1964 में एक ऐसी घटना घटी जिसने ‘डेरा इस्माइल खान’ नाम की टीम को इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज कर दिया.  यह कहानी सिर्फ एक शर्मनाक हार की नहीं, बल्कि उस हार के मलबे से उठकर अपनी पहली जीत हासिल करने के जुनून की है. 851रनों से हारी टीम, बना वर्ल्ड रिकॉर्ड जो आज भी बरकरार,Zoom1964 में पाकिस्तान में खेले गए फर्स्ट क्लास के मैच में एक टीम 851 रनों के अंतर से हारी मैच, ये वर्ल्ड रिकॉर्ड आज भी बरकरार

नई दिल्ली. खेल की दुनिया में अक्सर हम विजेताओं की गाथाएँ गाते हैं, लेकिन कभी-कभी हार की गहराई भी एक ऐसी कहानी बुनती है जो सदियों तक याद रखी जाती है. क्रिकेट की पिच पर जहाँ रिकॉर्ड बनते और टूटते हैं, वहाँ 1964 में एक ऐसी घटना घटी जिसने ‘डेरा इस्माइल खान’ नाम की टीम को इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज कर दिया.  यह कहानी सिर्फ एक शर्मनाक हार की नहीं, बल्कि उस हार के मलबे से उठकर अपनी पहली जीत हासिल करने के जुनून की है.

साल 1964 में पाकिस्तान के घरेलू क्रिकेट में दक्षिण खैबर पख्तूनख्वा की एक अनजान टीम, डेरा इस्माइल खान को पहली बार फर्स्ट-क्लास क्रिकेट खेलने का मौका मिला.  टीम के खिलाड़ी उत्साह से भरे थे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि उनका डेब्यू मैच एक ऐसा बुरा सपना बन जाएगा जिसे दुनिया कभी नहीं भूलेगी.

इतिहास की सबसे बड़ी हार

उनका मुकाबला दिग्गज टीम ‘पाकिस्तान वेस्टर्न रेलवे’ से था.  रेलवे की टीम ने रनों का पहाड़ खड़ा करते हुए 6 विकेट पर 910 रन बनाकर पारी घोषित कर दी.  जब डेरा इस्माइल खान की बारी आई, तो उनकी हालत ताश के पत्तों जैसी हो गई.  पहली पारी में पूरी टीम महज 32 रनों पर सिमट गई और दूसरी पारी में स्थिति और भी बदतर रही, जहाँ वे केवल 27 रन ही बना सके. नतीजा एक पारी और 851 रनों से हार.  फर्स्ट-क्लास क्रिकेट के इतिहास में रनों के अंतर से यह आज भी सबसे बड़ी हार का विश्व रिकॉर्ड है.

संघर्ष और नाकामियों का दौर

इस शर्मनाक शुरुआत के बाद किसी भी टीम का मनोबल टूट सकता था, लेकिन डेरा इस्माइल खान की कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई.  अगले दो दशकों तक यह टीम पाकिस्तान के घरेलू टूर्नामेंटों में संघर्ष करती रही.  वे मैच हारते रहे, कभी बहुत करीब आकर तो कभी बहुत बुरी तरह. उन्हें पाकिस्तान क्रिकेट का ‘अंडरडॉग’ माना जाने लगा.  इस सफर के दौरान टीम को ‘हजारा’ के रूप में अपना एक ऐसा प्रतिद्वंद्वी मिला, जिनसे उनकी प्रतिस्पर्धा रोमांचक होती थी.  छोटे शहरों से आए ये खिलाड़ी, जिनके पास न तो आधुनिक सुविधाएं थीं और न ही बड़ा अनुभव, बस खेल के प्रति अपने लगाव के कारण मैदान पर उतरते थे.

वो एक ‘चमत्कारी’ जीत

सालों की मेहनत, लगातार मिलती हार और लोगों के उपहास के बीच, आखिर वह दिन आया जिसने इतिहास बदल दिया.  दो दशकों के लंबे इंतजार के बाद, डेरा इस्माइल खान ने अपनी पहली फर्स्ट-क्लास जीत दर्ज की.  यह जीत केवल एक मैच का परिणाम नहीं थी, बल्कि उन सभी खिलाड़ियों की तपस्या का फल थी जिन्होंने रिकॉर्ड बुक में अपनी हार का नाम देखा था.  वह एक अकेली जीत किसी विश्व कप से कम नहीं थी. इसे ‘चमत्कार’ कहा गया क्योंकि इसने साबित किया कि हार का सिलसिला चाहे कितना भी लंबा क्यों न हो, वह स्थायी नहीं होता.

डेरा इस्माइल खान की कहानी हमें सिखाती है कि खेल सिर्फ जीतने का नाम नहीं है यह गिरने, फिर से खड़े होने और तब तक लड़ते रहने का नाम है जब तक कि आप अपनी मंजिल न पा लें आज जब हम इस ऐतिहासिक स्कोरकार्ड को देखते हैं, तो हमें वह 851 रनों की हार तो दिखती है, लेकिन उसके पीछे छिपा वह अटूट साहस भी दिखना चाहिए जिसने दो दशक बाद जीत का स्वाद चखा.

About the Authorराजीव मिश्रAssociate editor

मैं, राजीव मिश्रा, वर्तमान में नेटवर्क 18 में एसोसिएट स्पोर्ट्स एडिटर के रूप में कार्यरत हूँ. इस भूमिका में मैं डिजिटल स्पोर्ट्स कंटेंट की योजना, संपादकीय रणनीति और एंकरिंग की जिम्मेदारी निभाता हूँ. खेल पत्रका…और पढ़ें

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Location :

New Delhi,Delhi

First Published :

April 29, 2026, 14:21 IST

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