शंघाई ग्रुप के दोस्तों से हाथ मिलाने में हिचकिचाता क्यों रहा भारत? SCO में वेट ऐंड वॉच का फैक्टर समझिए

Why India Joined SCO: क्या आपने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का नाम सुना है? अगले सप्ताह किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में Shanghai Cooperation Organisation का शिखर सम्मेलन होने जा रहा है. यह यूरोप और एशियाई सीमा क्षेत्र यानी यूरेशियाई देशों में राजनीतिक, आर्थिक, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा से जुड़ा एक संगठन है. पॉपुलेशन और जियोग्राफी के मामले में इसको दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन भी कहा जाता है. इस संगठन के केंद्र में चीन, रूस, भारत और पाकिस्तान जैसे प्रमुख देश हैं. इसके साथ ही कई मध्य एशियाई और मिडिल ईस्ट देश भी इसके सदस्य हैं. हालांकि भारत इस शंघाई संगठन के साथ शुरू से नहीं रहा, बल्कि कई सालों तक वेट ऐंड वॉच की स्थिति के बाद इसका सदस्य बना. आखिर ऐसा क्यों, आइए समझते हैं.
शंघाई फाइव से शुरुआत SCO की जड़ें 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद के दौर से जुड़ी हैं. सोवियत संघ के टूटने के बाद जो नए मिडिल ईस्ट गणराज्य (कजाखस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान) बने, उनकी सीमाएं चीन और रूस से लंबी और खुली सीमाओं के जरिए मिलती थीं. सीमा विवादों को सुलझाना, सैन्य तनाव को कम करना और सीमा पार के जातीय अलगाववाद को रोकना उस समय की सबसे बड़ी सुरक्षा प्राथमिकताएं बन गई थीं. इन्हीं चिंताओं को दूर करने के लिए 1996 में शंघाई फाइव नाम से एक सहयोग मंच बनाया गया था, जिसमें शामिल देशों की लिस्ट में चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान शामिल थे.
SCO के रूप में इसका विकास चूंकि यह पहल ऐतिहासिक और आपसी विश्वास को मजबूत करने में बेहद कामयाब रहा, इसलिए सदस्य देशों ने इसके दायरे को केवल सीमा सुरक्षा मंच से बढ़ाकर एक व्यापक क्षेत्रीय सहयोग ढांचे में बदलने का फैसला किया. उज्बेकिस्तान को आधिकारिक रूप से शामिल करने के बाद 15 जून 2001 को इस समूह का नाम बदलकर औपचारिक रूप से शंघाई सहयोग संगठन (SCO) कर दिया गया. जून 2002 में SCO चार्टर पर हस्ताक्षर किए गए और सितंबर 2003 में यह आधिकारिक रूप से लागू हो गया. इसके तहत बीजिंग में SCO का सचिवालय और ताशकंद में क्षेत्रीय आतंकवाद-विरोधी संरचना (RATS) जैसे सिस्टम स्थापित किए गए.
भारत को इसमें शामिल होने में इतनी देर क्यों लगी? हालांकि भारत को 2005 में ही SCO में ऑब्जर्वर का दर्जा मिल गया था, लेकिन वह जून 2017 तक इसका फुलटाइम मेंबर नहीं बन पाया था. भारत की इस देरी के पीछे जटिल जियो पॉलिटिकल इक्वेशन, अंदरूनी इंस्टिट्यूशनल दिक्कतें और क्षेत्रीय संतुलन की रणनीतियां थीं.
चीन-रूस पावर सेंटर: लंबे समय तक SCO का मुख्य पावर सेंटर रूस और चीन के इर्द-गिर्द घूमता रहा. चीन इस बात को लेकर आशंकित था कि भारत को फुलटाइम मेंबरशिप देने से संगठन का अंदरूनी शक्ति संतुलन बिगड़ सकता है या फिर संगठन के अंदर कोई दूसरा गुट बन सकता है.
भारत का बैलेंस ऐक्ट: इसके विपरीत, कुछ भारतीय रणनीतिकारों का यह भी मानना था कि SCO रूस-चीन का एक क्लब है या यह पश्चिमी देशों के खिलाफ एक संभावित मंच है, जो भारत की रणनीतिक इंडिपेंडेंस के खिलाफ भी जा सकता है. कुछ लोगों को यह भारत की गुट निरपेक्ष नीति के उलट महसूस होता था.
पाकिस्तान का फैक्टर: जब भारत ने औपचारिक रूप से पूर्ण सदस्यता के लिए प्रयास शुरू किया, तो बीजिंग ने अपने सदाबहार दोस्त पाकिस्तान को भी इसी के साथ शामिल करने के लिए जोर डाला. चीन ने पाकिस्तान की एंट्री को एक सौदेबाजी के रूप में इस्तेमाल किया ताकि भारत के कद को संतुलित किया जा सके और दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय समानता बनी रहे. इस जटिल कूटनीतिक सौदेबाजी के कारण आम सहमति बनने में देरी हुई, जिसका नतीजा यह हुआ कि 2017 में अस्ताना शिखर सम्मेलन में भारत और पाकिस्तान दोनों को एक साथ शामिल किया गया.
भारत ने आखिरकार इसमें शामिल होने का फैसला क्यों किया?बाधाओं और अपने पाकिस्तान जैसे दुश्मन देश के शामिल होने के बावजूद, भारत यह समझ चुका था कि इस समूह से बाहर रहने का मतलब अपने ही पड़ोस में अपनी अहम आवाज को खो देना है। भारत के शामिल होने के फैसले के पीछे कई मुख्य कारण थे:
आतंकवाद से मुकाबला: क्षेत्रीय आतंकवाद-विरोधी संरचना (RATS) के माध्यम से भारत को खुफिया जानकारी साझा करने, आतंकवाद विरोधी रणनीतियों और नशीले पदार्थों की तस्करी तथा कट्टरपंथ पर लगाम लगाने के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रीय प्रयासों तक पहुंच मिलती है.
मध्य एशिया में कनेक्टिविटी: मध्य एशिया प्राकृतिक संसाधनों जैसे तेल, यूरेनियम, गैस से समृद्ध है और यह इसको भारत के एक्सटेंडेड नेबर का दर्जा मिला है. फुलटाइम मेंबरशिप से भारत को आर्थिक संबंधों को मजबूत करने के साथ ही रुकी हुई एनर्जी पाइपलाइनों (जैसे TAPI) को आगे बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय नॉर्थ साउथ परिवहन गलियारे (INSTC) जैसे ऑप्शनल व्यापार मार्गों को बढ़ावा देने के लिए एक मंच मिलता है.
यूरेशिया में प्रभाव का संतुलन: सदस्यता यह सुनिश्चित करती है कि चीन मध्य एशिया में अकेले ही राजनीतिक, आर्थिक या सुरक्षा व्यवस्था तय ना कर सके. यह भारत की पारंपरिक मल्टी-अलाइनमेंट नीति के भी अनुकूल है, जिससे नई दिल्ली SCO और BRICS जैसे मंचों पर सक्रिय रूप से जुड़ने के साथ-साथ पश्चिमी देशों के साथ भी अपनी साझेदारी बनाए रख सकती है.
SCO इस समय सोवियत संघ के बाद के बॉर्डर मैनेजमेंट मंच से डेवलप होकर यूरेशिया का एक बहुत बड़ा भू-राजनीतिक ब्लॉक बन चुका है. महाशक्तियों की राजनीति, चीन-पाकिस्तान की रणनीतिक जुगलबंदी और सतर्क संस्थागत विकास के कारण भारत की एंट्री में देरी हुई. हालांकि, एनर्जी कॉरिडोर को सुरक्षित करने, क्षेत्रीय आतंकवाद का मुकाबला करने और मध्य एशिया में अपनी रणनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने के लिए भारत ने आखिरकार इसमें शामिल होने का ऐतिहासिक फैसला किया.



